अंटार्कटिका की यात्रा

गोवा से र्कपटाउन तक कौ यात्रा तो हवाई जहाज से एक ही दिन में पूरी हो जाती है । भारत से दक्षिण अफ्रीका कै बीच यह’ विमान रात को उडता है और वह भी सागर कै ऊपर से, तो कूछ भी देखने लायक नहीं होता । कैपटाउन पहुंचने कै बाद अगर समय मिला तो कुछ पर्यटक स्थल घूमने को मिल जाते हैं । इनमें वास्को दा गामा द्वारा नामकरण किया गया ‘कैप आँफ गुड होप एक सुदर स्थान है…अफ्रीका कै महाद्वीप का दक्षिणी छोर जहाँ पर हिंद महासागर और अटलांटिक महासागर मिलते हैं ।

इसक बाद आरंभ होती है पानी कै जहाज की यात्रा । यहाँ से अंटार्कटिका करीब 4,000 किलोमीटर दूर रह जाता हैं । पूराने जमाने कै धानी कै जहाज लकडी कै बने होते थे । अंटार्कटिका कै ब्रफीले सागर में जाने कै लिए इन्हें खास तरीकै से मजबूत बनाया जाता था । जहाज ५ कै सामने कै हिस्से में लकडी की दोहरी दोबारबनाई जाती थी और उस पर भो चाहर की ओर लोहे की चादरें चढाई जाती थीं । इस सबर्क चाद भी पैकआइस की ठवकर सेइन जहाजों में अकसर छेद हो जाते थे और अगर जहाज हर और से पैकआइस की जकड में आ गया तो वह मसलकर टुकडे…टुवन्हे हो जाता था । इन जहाजों कौ लंबाई औसतन 30 मीटर और चौडाई र्कवल 8 मीटर की होती थी । इनकी अधिकतम भार क्षमता लगभग 300 टन की होती थी । इनमें कोयले से चलनेवाले भाप कै इंजन लगेहोते थे, जो बस 150-200 -हॉर्सपावर कैं होते थे ।

आज कै आधुनिक जहाज लकडी की जगह स्टील कै बने होने हैं । ये 200 मीटर तक लंबे और करीब 30 मीटर चौडे होते हैं । इनकी भार क्षमता 20,000 टन तक होती है । इन जहाजों में दो इंजन लगे होते हैं, जो आसानी से 25 ,000 हॉसंपावर तक को शक्ति पैदा कर सकते हैं । फिर भी बिना खास मजबूती दिए हूए कोई सामान्य जहाज अंटार्कटिक सागर में जाने का दुदृस्राहस नहीं करता । स्टील क ३इन जहाजों क्रो भी इस्पात को दोहरी-तिहरी चादरों से ढका जाता है । ये ‘आइसक्लास शिप’ कहलाते हैं । जहाज कै पिछले हिस्से में ‘प्रॉपलर व रडर’, यानी जहाज चस्तानेचाला पंखा और पतवार, भी ऐसे आकार कै अंदर होकर बनाए जाते हैं कि पैकआइस कै टुकडे उनपर सीधी मार न कर सकें ।

हसर्क अलावा एक और तरह कै विशेष जहाज़ बनाए जाते हैं, जो ‘आक्सब्रेकर शिप’ कहलाते हैं । यह आइसबेकर सघन पैक’आइस और फास्ट’आहस में से भी रास्ता काटते हुए जा सकते हैं ।यह समुद्र की बर्फ को वास्तव में काटते नहीं हैं, बल्कि जहाज का अगला हिस्सस्ना बर्फ पर सवार हो जाता है, उसर्क भारी वजन से ’यह टूट जाती हैँ और रास्तस्ना बनता जाता है । इसर्क लिए जहाज का डिजाइन ऐसा बनाया जाता है कि अगला हिस्सा ऊपर की और हलका सा उठाव लिये होता है । आज कै सबसे शक्तिशाली आक्सबेकर परमाणु ऊजांचास्ने इंजनों से चलते हैं और इनकी ताकत 90,000 होंर्सपावर से भी अधिक होती हैं 1

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