अंटार्कटिका में भारत भाग 4

हालाँकि अधिकांश प्रस्ताव बिज्ञान कै बिथिन्न विषयों वो ही होते हैं, पर यदि कार्यं महत्त्व का है तो अन्य क्षेत्रों कै प्रस्ताव भी स्वीकार कर लिये जाते हैं । उदाहरण कै लिए प्रसिध्द फोटोग्राफर, पत्रकार, मनोवैज्ञानिक; समाजशक्वी .मी हमारे अंटार्कटिक अभियानों में भाग रने चुकें हैं।

दल का एक दूसरा हिस्सा भी होता है, जो वैज्ञानिक कार्य तथा ‘मैत्री’ स्टेशन कै रख-रखाव में सहायता देने क लिए चुना जाता है । इसमें करीब 13 सदस्य भारतीय सेना कै होते हैं, जो स्टेशन की इमारत, उसको गरम रखनेवाले बॉयलर, जनरेटर, पानी की पाइप लाइनें, बिजली कै तार, बर्फ पर चलनेवाली गडियॉ आदि सँभालते हैं । यहीँ सदस्य गाडियों का कारवाँ बनाकर करीब सौं किलोमीटर दूर आहसशेल्फ पर उतारे हुए सारे राशन, ईधन, विविध यंत्रों आदि क्रो खींचकर मैत्री तक लाते हैँ । इनर्क अलावा दो सदस्य संचार माध्यमों की देखभाल कै लिए होते हैँ…फोन, फैक्स, ई-मेल, एच.एफ़. रेडियो आदि उपकरणों क रख-रखाव कै लिए। पहले यह काम भारतीय नौसेना सैभालती थी, आजकल इनका चयन प्राय: देहरादून की डिफेंस इलेवट्रॉनिक्स लैब से होता है: कुछ बार भारत संचार निगम आदि कै विशेषज्ञ भी चुने गए हैं । टीम में दो डॉक्टर भी होते हैं, जो सभी सदस्यों कै रवस्थ्य र्क लिए जिम्मेदार होते हैँ । इनका खुला चयन होता है, किसी भी क्षेत्र से । सर्जन और एनेस्वैटिस्ट को वरीयता दो जाती है, अन्यथा कोई भी 1४113135. डॉक्टर लिया जा सकता है । डॉक्टरों का चुनाव सेना, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस, रेलवे, र्कइ सरकार र्क सी.जी॰एच॰एस. , भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, राज्य सरकारों की मेडिक्ल सर्विस और यहॉ तक कि निजी क्षेत्र से भी किया जाता है।

सेना, संचार और मेडिक्ल कै ये सहायक सदस्य कवल 16 महीनों र्क लिए ही चुने जाते हैं । इनकै अलावा टीम में दो रसोइए भी होते हैँ-एक 16 महीनों क लिए और दूसरा 4 महीनों कै लिए। इनका चयन अकसर भारत-तिब्बत सीमा पुलिस, भारतीय रपेना, भारतीय नौसेना या भारतीय तटरक्षक दल से किया जाता है ।

विशेषज्ञ समिति द्वारा वैज्ञानिक प्रस्ताव स्वीकार होने पर ही किला फतह नहीं हो जाता, अभी त्तो ,कैवल वह रिसर्च प्रोजेक्ट ही अंटार्कटिका कै लिए स्वीकार किया गया है, वह व्यक्ति नहीं ९ उस प्रस्तावक को’ यह भी साबित करना होता है कि वह अटैग्रर्कटिका में जाकर यह कार्य करने में समर्थ है 1 अंटार्कटिका जाने कै लिए उम्र क्री कोई सीमा नहीं है, पर शरीर का स्वस्थ होना आवश्यक हैं । इसक लिए अगस्त कै महीने में दिल्ली कै अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में एक ‘नख-शिख’ मेडिकल जाँच होती हैं-यानी पैर क नाखून से लेकर सिर कै छोर तक ५ पैथोलॉजी में खून की जाँघ, फेफडों का एक्सरे, ईसीजी. से दिल को धडकनें, आंखों की रोशनी, दांतों कै छेद, देह की हड्डियाँ आदि हर अंग

क्रो ठोक-बजाकर परखा जाता हैं । विंटर टीम कै उम्मीक्वारों को तो एक विस्तृत मनोवैज्ञानिक परीक्षण से भी गुजरना होता है, यह जाँचने कै लिए कि सारी दुनिया से कटकर अंटार्कटिका कै 16 महीने कै एकांतवास में वे रह भी पाएँगे या नहीं 1 और यह भी कि इस लंबे तनाव मरें काल कै दौरान वे दल र्क अन्य सदस्यों र्क साथ मिल-जुलकर कार्य करने कै काबिल हैं या नहीं १ इन सारी परीक्षाओं में ‘पास’ हो जाने पर आगे को दौड कै लिए हरी झंडी दिखा दो जाती है ।

अब आती है आखिरी बाधा, अंटार्कटिका जाने र्क पहले हिमालय में बर्फ पर एक दूँर्निग । उत्तरांचल में बदरीनाथ र्क मागं पर, . जोशीमठ बदे पास, ‘ओली’ नाम का स्की-प्रशिक्षण केंद्र है । यहाँ पर भारत-तिब्बत सीमा पुलिस का एक विशाल हूँनिंग सेंटर है: जहाँ पर्वतारोहण, स्कोझेक्व, बर्फ में बचाव आदि क्षेत्रों में भारत कै श्रेष्ठतम प्रशिक्षक उपलब्ध हैं । इनमें से कई तो एवरेस्ट कै शिखर पर चढ चूकै हैं । यहॉ अंटार्कटिका जानेवाले दल को सितंबर कै महीने में लगभग दस दिनों तक बर्फ से परिचय और बचाव-तकनीक की जानकारी दो जातौ है । यही समय होता है, जब वैज्ञानिक कार्य ओर सहायता कार्य कै लिए चुने गए दलों कै दोनों हिस्से साथ-साथ रहते हैं, एक-दूसरे क्रो जानते-समझते हैं और आनेवाले अभियान र्क लिए घुल-मिलकर एक ही टोम बन जाते हैं । इस हूँकिं। को सफलतापूर्वक समाप्त कर लेने कै बाद उम्मीदवार का चयन पूरा हो जाता है और बह आनेवाले अंटार्कटिक अभियान दल का सदस्य बन जाता है ।

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